मेहनत का हल जब चलाये मज़दूर
यत्नों से लोहा मनवाये मज़दूर
पत्थर से नींव तक, जी हुज़ूर
नींव से दीवारों तक, जी हुज़ूर
दीवारों से मकान तक, जी हुज़ूर
यत्नों की प्रतिमूरत सी
खून में पसीना भी
पसीने में मिट्टी भी
और मिटटी में मिल जाये जिसका नूर
वो है मज़दूर, हाँ वही तो है मज़दूर...
मेहनत का हल जब चलाये मज़दूर
यत्नों से लोहा मनवाये मज़दूर
गरीबी से लाचार भी
मेहनत उसका औज़ार ही
मिटटी से पक्की मैत्री भी
हस्तों से सपनों की हूर
मेहनताना है कोसों दूर
पर म्हणत करता वह ज़रूर
और अग्नि-तपस में मिल जाये जिसका नूर
वो है मज़दूर, हाँ वही तो है मज़दूर...
यत्नों से लोहा मनवाये मज़दूर
पत्थर से नींव तक, जी हुज़ूर
नींव से दीवारों तक, जी हुज़ूर
दीवारों से मकान तक, जी हुज़ूर
यत्नों की प्रतिमूरत सी
खून में पसीना भी
पसीने में मिट्टी भी
और मिटटी में मिल जाये जिसका नूर
वो है मज़दूर, हाँ वही तो है मज़दूर...
मेहनत का हल जब चलाये मज़दूर
यत्नों से लोहा मनवाये मज़दूर
गरीबी से लाचार भी
मेहनत उसका औज़ार ही
मिटटी से पक्की मैत्री भी
हस्तों से सपनों की हूर
मेहनताना है कोसों दूर
पर म्हणत करता वह ज़रूर
और अग्नि-तपस में मिल जाये जिसका नूर
वो है मज़दूर, हाँ वही तो है मज़दूर...
