तब भी इसमें होते हैं शूल,
जब भी उड़ती है ये धूल,
मनुष्य के पार लगते हैं कूल।
आवाज़ है नदियों की कलकल,
घिर-घिर आये काले बादल,
आवाज़ है नदियों की कलकल,
पता नहीं बचेंगी भी ये क्या कल?
खेतों में जब चलता है हल,
वहां भी चाहिए नदियों की कलकल।
मधुर-मधुर बहती है पवन,
मधुर-मधुर बहती है पवन,
ठंडी-ठंडी है ये पवन,
मनुष्य को लगती चंचल ये पवन,
पशु-पक्षियों की साथी ये पवन।
घिर-घिर आये काले बादल,
गरज-गरज कर काले बादल,
हवा से उड़ते काले बादल,
सबको भाने वाले बादल।
प्रेम करो इन फूलों से,
प्रेम करो इन फूलों से,
प्रेम करो इन नदियों से,
प्रेम करो इस पवन से,
प्रेम करो इन बादलों से,
प्रेम करो पर्यावरण की हर इक-इक कड़ी से।


Nice Poem....
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