अंतः आत्मा : भ्रूण व्यथा

रूह से इक आई आवाज़ 'माँ',
मैं इतनी बुरी हूँ क्या 'माँ'?
क्यों मैं इस दुनिया का हिस्सा नहीं?
क्यों मैं तुम्हारी खुशी का किस्सा नहीं? 

भाई तो आया है इस दुनिया में,
क्यों मेरा ही बहिष्कार इस दुनिया में?
क्यों रह गयी कमी तेरी ममता में?
क्यों मेरी कोई जगह नहीं जनता में?

मुझको कौन मेरा हक़ दिलवाएगा?
रु-ब-रु कौन दुनिया से करवाएगा?
कौन इस जहाँ के रंग मुझे दिखलाएगा?
कौन मुझे जीने की उमंग बतलाएगा?

अगर मैं इस दुनिया में आऊँगी,
माँ तुम्हारी बेटी ही तो कहलाऊँगी,
फिर आखिर मैं भी 'कल्पना' बन-दिखाऊँगी,
और इस नीले नभ में उड़ान भी भर पाऊँगी... उड़ान भी भर पाऊँगी...


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